परम पूज्य श्री श्री १००८ नानतिन महाराज जी

परम पूज्य श्री श्री १००८ नानतिन महाराज जी

परम पूज्य श्री श्री १००८ नानतिन महाराज जी

यूं तो कई ऋषि-मुनियों साधु-संतों ने उत्तराखंड की पावन भूमि को अपने तपस्थली के रूप में चुना।  इस प्रकार के संतों व अवतारों में महावतार बाबाजी, नीब करौरी महाराज जी, सोमवारी बाबाजी, स्वामी विवेकानंद, स्वामी शिवानंद, कैलाशनाथ बाबा जी और अनेकों संत हुए हैं, अगर इस प्रकार  के संतों की एक सूची बनायी जाए तो मुझे लगता है कि हमारी लेखनी कम पड़  जाएगी। यह सब संत मुनि जन आज भी सूक्ष्म रूप में कहीं ना कहीं उत्तराखंड की पावन भूमि में साधनारत हैं। आध्यात्मिक रूप से जिज्ञासु मनुष्यों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से अभी भी दर्शन देते हैं।  इन्हीं ऋषि-मुनियों में एक त्रिकालदर्शी संत बाल सुलभ क्रीड़ाएँ करने वाले अलौकिक शक्तियों से युक्त पूज्य पाद श्री श्री १००८ नानतिन महाराज जी भी हुए।

परम पूज्य नंदन महाराज जी के जन्म स्थान और काल के बारे में कोई प्रत्यक्ष प्रमाण तो नहीं है परंतु फिर भी लोकवाणी के अनुसार उनका जन्म मध्यप्रदेश के मुरैना जिले में पोरसा तहसील में चंबल नहर के किनारे बसे गांव ‘रुअर’ में  एक ब्राह्मण परिवार में हुआ। इनके पिता का नाम पंडित श्यामलालमाता का नाम देवी सुभद्रा था। इनके एक भाई रामेश्वर दयाल व एक छोटी बहन देवी राम प्यारी थी। इनके भाई ने भी छोटी उम्र में ही सन्यास ले लिया, वह राघवदास नाम से जाने गए।

श्री महाराज जी लगभग ६ वर्ष की उम्र में घर त्याग कर अयोध्या जी के हनुमानगढ़ी जा पहुंचे तथा कुछ समय तक हनुमान जी की पूजा अर्चना की। हनुमानगढ़ी के महंत जी ने उनकी योग्यता को देखकर ७ वर्ष की उम्र में ही आश्रम की पूरी जिम्मेदारी सौंप दी।  कुछ दिन रुकने के बाद श्री महाराज जी ने सोचा कि मैं तो प्रभु भक्ति के लिए निकला था और यहां फिर से फंस गया तो यह ठीक नहीं है।  यह सोचकर उन्होंने चाबी का गुच्छा पास में ही स्थित तालाब में फेंक कर श्री बद्री नारायण जी के दर्शन के लिए निकल पड़े। श्री बद्री विशाल के दर्शन के बाद वह बागेश्वर में स्थित शिव मंदिर में जा पहुंचे। कुछ दिन बागेश्वर में रहने के पश्चात वह पिथौरागढ़ के निकट राम गंगा के किनारे आंवला घाट नामक स्थान पर स्थित एक निर्जन गुफा में रहने लगे। वहां पर जंगल में घास काटने आई महिलाओं ने उनके दर्शन किए व आश्चर्यचकित हुए।  घास लेने गई महिलाओं ने अन्य लोगों को सूचना दी कि कोई नानतिन जोगी गुफा में बैठे हैं। कुमाऊनी में छोटे बच्चों को नानतिन नाम से बुलाया जाता है। इस प्रकार श्री महाराज जी का नाम नानतिन बाबा पड़ा। महाराज जी ने सन्यास के बाद श्री सिद्ध गिरि नाम ग्रहण किया।

श्री महाराज जी संपूर्ण सिद्धियों से युक्त, त्रिकालदर्शी, अनंत औषधीय ज्ञान से परिपूर्ण थे।  उनके द्वारा लाखों मनुष्यों का दैहिक, दैविक और भौतिक समस्याओं का समाधान हुआ और लोगों को परमपिता परमेश्वर के निकट जाने व प्रेम बढ़ाने के लिए प्रेरित करते रहें। उनके औषधीय ज्ञान के द्वारा अनेकों निर्बल और असहाय लोगों को असाध्य रोगों से मुक्ति मिली।  लोग उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने के लिए स्वयं ही उनकी ओर खींचे चले जाते थे वे सामान्यतः किसी को किसी प्रकार का प्रवचन नहीं करते थे भक्तों को उनके निकट रहते हुए, उनकी कृपा दृष्टि के फलस्वरूप स्वतः ही ज्ञान प्राप्त हो जाता था।

वर्तमान में नैनीताल जनपद के भवाली क्षेत्र से लगभग २ किमी० की दूरी पर श्यामखेत नामक स्थान पर परम पूज्य श्री श्री १००८ नानतिन महाराज जी का आश्रम स्थित है। महाराज जी का समाधी स्थल इसी स्थान पर है।

यहाँ प्रत्येक वर्ष १२ जनवरी को विशाल भंडारे का आयोजन किया जाता है, जिस हेतु श्रद्धालु देश के विभिन्न स्थानों से प्रसाद ग्रहण करने आते हैं।

गुरुदेव भगवान् की जय