प्रातःस्मरणीय श्लोक

प्रातःस्मरणीय श्लोक

श्री गणेश प्रातः स्मरण स्तोत्र

प्रात: स्मरामि गणनाथमनाथबन्धुं

 सिन्दूरपूरपरिशोभितगण्डयुग्मम् ।

उद्दण्डविघ्नपरिखण्डनचण्डदण्ड–

 माखण्डलादिसुरनायकवृन्दवन्द्यम् । ।

अर्थ- अनाथों के बन्धु, सिन्दूर से शोभायमान दोनों गण्डस्थल वाले, प्रबल विघ्न का नाश करने में समर्थ एवं इन्द्रादि देवों से नमस्कृत श्री गणेश जी का मैं प्रातः काल स्मरण करता हूँ।

श्रीमन्नारायण प्रातः स्मरण स्तोत्र

प्रातः स्मरामि भवभीति महार्तिनाशम्

नारायणं गरूडवाहनमब्जनाभम्।

ग्राहाभिभूत वरवारणमुक्तिहेतुं

चक्रायुधं तरुणवारिजपत्रनेत्रम् ॥

अर्थ- संसार के भय रूपी महान् दुःख को नष्ट करने वाले, ग्राह से गजराज को मुक्त करने वाले, चक्रधारी एवं नवीन कमल दल के समान नेत्र वाले, पद्मनाभ गरुडवाहन भगवान् श्रीनारायण का मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ।

श्री शिव प्रातःस्मरण स्तोत्रम्

प्रातः स्मरामि भवभीतिहरं सुरेशं
गङ्गाधरं वृषभवाहनमम्बिकेशम् ।
खट्वाङ्गशूलवरदाभयहस्तमीशं
संसाररोगहरमौषधमद्वितीयम् ॥

अर्थ- संसार के भय को नष्ट करने वाले, देवेश, गंगाधर, वृषभवाहन, पार्वतीपति, हाथ में खटवांग एवं त्रिशूल लिये और संसार रूपी रोग का नाश करने के लिए अद्वितीय औषध-स्वरूप, अभय एवं वरद मुद्रा युक्त हस्तवाले भगवान् शिव का मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ।

देवी प्रातः स्मरण स्तोत्र

प्रातः स्मरामि शरदिन्दुकरोज्ज्वलाभां,

सद्रत्नवन्मकरकुण्डलहारभूषाम्।

दिव्या युधोर्जित सुनील सहस्त्रहस्तां,

रक्तोत्पलाभचरणां भवतीं परेशाम्॥

अर्थ- शरद कालीन चन्द्रमा के समान उज्जवल आभा वाली, उत्तम रत्नों से जड़ित मकर कुण्डलों तथा हारों से सुशोभित, दिव्यायुधों से दीप्त सुन्दर नीले हजारों हाथों वाली, लाल कमल की आभायुक्त चरणों वाली भगवती दुर्गा देवी का मैं प्रातःकाल स्मरण करता हूँ।

सूर्य देव प्रातः स्मरण स्तोत्र

प्रातः स्मरामि खलु तत्सवितुर्वरेण्यं,

रूपं हि मण्डलमृचोऽथ तनुर्यजूंषि।

सामानि यस्य किरणाः प्रभवादिहेतुं,

ब्रह्माहरात्मकमलक्ष्यमचिमत्यरूपम्॥

अर्थ- सूर्य का वह प्रशस्त रूप जिसका मण्डल ऋग्वेद, कलेवर यजुर्वेद तथा किरणें सामवेद हैं। जो सृष्टि आदि के कारण हैं, ब्रह्मा और शिव के स्वरूप हैं तथा जिनका रूप अचिन्त्य और अलक्ष्य है, प्रातः काल मैं उनका स्मरण करता हूँ।

त्रिदेवों के साथ नवग्रह स्मरण

ब्रह्मा मुरारिस्त्रिपुरान्तकारी

भानु: शाशी भूमिसुतो बुधश्च ।

गुरुश्च शुक्र: शनिराहुकेतवः

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥

अर्थ- ब्रह्मा, विष्णु (राक्षस मुरा के दुश्मन, श्रीकृष्ण या विष्णु), शिव (त्रिपुरासुर का अंत करने वाला, श्री शिव), सूर्य, चन्द्रमा, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु- ये सभी देवता मेरे प्रातःकाल को मंगलमय करें ।

ऋषि स्मरण

भृगुर्वसिष्ठः क्रतुरंगिराश्च

मनु: पुलस्त्य: पुलहश्च गौतम: ।

रैभ्यो मरीचिश्च्यवनश्च दक्षः

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥

अर्थ- भृगु, वसिष्ठ, क्रतु, अंगिरा, मनु, पुलस्त्य, पुलह, गौतम, रैभ्य, मरीचि, च्यवन और दक्ष- ये समस्त मुनिगण मेरे प्रातःकाल को मंगलमय करें ।

सनत्कुमार: सनक: सनन्दन: सनातनोऽप्यासुरिपिंगलौ च ।

सप्त स्वरा: सप्त रसातलानि कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥

अर्थ- सनत्कुमार, सनक, सनन्दन, सनातन (ब्रह्माजी के मानसपुत्र बाल ऋषि), आसुरि (सांख्य-दर्शन के प्रर्वतक कपिल मुनि के शिष्य) एवं पिंगल (छन्दों का ज्ञान कराने वाले मुनि)-ये ऋषिगण; साथ ही नाद-ब्रह्म के विवर्तरूप षड्ज, ऋषभ, गान्धार, मध्यम, पंचम, धैवत और निषाद- ये सप्त स्वर; और हमारी पृथ्वी से नीचे स्थित सातों रसातल (अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल, और पाताल) मेरे प्रातःकाल को मंगलमय करें।

सप्तार्णवा: सप्त कुलाचलाश्च सप्तर्षयो द्वीपवनानि सप्त

भूरादिकृत्वा भुवनानि सप्त कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥

अर्थ- सप्त समुद्र (अर्थात भूमण्डल के लवणाब्धि, इक्षुसागर, सुरार्णव, आज्यसागर, दधिसमुद्र, क्षीरसागर और स्वादुजल रूपी सातों सलिल-तत्व), सप्त पर्वत (महेन्द्र, मलय, सह्याद्रि, शुक्तिमान्, ऋक्षवान, विन्ध्य और पारियात्र), सप्त ऋषि (कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, गौतम, जमदग्नि, वशिष्ठ, और विश्वामित्र), सातों द्वीप (जम्बू, प्लक्ष, शाल्मली, कुश, क्रौच, शाक, और पुष्कर), सातों वन (दण्डकारण्य, खण्डकारण्य, चम्पकारण्य, वेदारण्य, नैमिषारण्य, ब्रह्मारण्य और धर्मारण्य), भूलोक आदि सातों भूवन (भूः, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, और सत्य) सभी मेरे प्रभात को मंगलमय करें।

प्रकृति स्मरण

पृथ्वी सगन्धा सरसास्तथाप:

स्पर्शी च वायुर्ज्वलितं च तेज:।

नभ: सशब्दं महता सहैव

कुर्वन्तु सर्वे मम सुप्रभातम् ॥

अर्थ- गन्धयुक्त पृथ्वी, रसयुक्त जल​, स्पर्शयुक्त वायु, प्रज्वलित तेज​, शब्दसहित आकाश एवम् महत्तत्व​- ये सभी मेरे प्रातःकाल को मंगलमय करें ।

इत्थं प्रभाते परमं पवित्रं पठेत् स्मरेद्वा शृणुयाच्च भक्त्या ।

दुःस्वप्ननाशस्त्विह सुप्रभातं भवेच्च नित्यं भगवत्प्रसादात् ॥

अर्थ- इस प्रकार उपर्युक्त इन प्रातः स्मरणीय परम पवित्र श्लोकों का जो मनुष्य भक्ति पूर्वक प्रातःकाल पाठ करता है, स्मरण करता है अथवा सुनता है, भगवद्दया से उसके दुःस्वप्न का नाश हो जाता है और उसका प्रभात मंगलमय होता है।