सत्य की महिमा || श्रीशिवमहापुराण, उमासंहिता

सनत्कुमार जी कहते हैं-हे व्यासजी सत्य ही परब्रहम है, सत्य ही परम तप है, सत्य ही श्रेष्ठ यज्ञ है और सत्य ही उत्कृष्ट ज्ञान है। सोये हुए पुरुषों में सत्य ही जगता है, सत्य ही परम पद है, सत्य से ही पृथ्वी टिकी हुई है और सत्य में ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। तप, यज्ञ, पुण्य, देवता, ऋषि और पितरों का पूजन, जल और विद्या - ये सब सत्य पर ही अविलम्बित है। सबका आधार सत्य ही है। सत्य ही यज्ञ, तप, दान, मन्त्र, सरस्वतीदेवी तथा ब्रहमचर्य है। ओंकार भी सत्यरूप ही है। सत्य से ही वायु चलती है, सत्य से ही सूर्य तपता है, सत्य से ही आग जलाती है और सत्य से ही स्वर्ग टिका हुआ है। लोक में सम्पूर्ण वेदों का पालन तथा सम्पूर्ण तीर्थों का स्नान केवल सत्य से सुलभ हो जाता है। सत्य से सब कुछ प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है । एक सहस्र अश्वमेध और लाखों यज्ञ एक ओर तराजू पर रखे जायॅ और दूसरी ओर सत्य हो तो सत्य का ही पलड़ा भारी होगा। देवता, पितर, मनुष्य, नाग, राक्षस तथा चराचर प्राणियों सहित समस्त लोक सत्य से ही प्रसन्न होते है। सत्य को परम धर्म कहा गया है। सत्य को ही परम पद बताया गया है और सत्य को ही परब्रहम परमात्मा कहते हैं। इसलिए सदा सत्य बोलना चाहिये। सत्य परायण मुनि अत्यन्त दुष्कर तप करके अप्सरागणों से घिरे हुए विशाल परिमाण वाले विमानों द्वारा स्वर्ग को प्राप्त हुए हैं तथा सत्य धर्म में अनुरक्त रहने वाले सिद्ध पुरुष भी सत्य से ही स्वर्ग के निवासी हुए हैं। अतः सदा सत्य बोलना चाहिये। सत्य से बढ़कर दूसरा कोई धर्म नहीं है। सत्यरूपी तीर्थ अगाध, विशाल, सिद्ध एवं पवित्र जलाशय है। उसमें योगयुक्त होकर मन के द्वारा स्नान करना चाहिये। सत्य को परम पद कहा गया है। जो मनुष्य अपने लिये, दूसरे के लिये अथवा अपने बेटे के लिये भी झूठ नहीं बोलते-वे ही स्वर्गगामी होते हैं। वेद, यज्ञ तथा मन्त्र-ये बा्रहमणों में सदा निवास करते है; परन्तु असत्यवादी ब्राहमणों में इनकी प्रतीति नहीं होती। अतः सदा सत्य बोलना चाहिये।

 

श्रीशिवमहापुराण, उमासंहिता